साहित्यशाला (Home) » हिंदी कविता विश्लेषण » त्रिलोचन शास्त्री 'उनका हो जाता हूँ' कविता का भावार्थ | त्रिलोचन का मनोवैज्ञानिक रहस्य "इस कविता का सार: जब दर्द शब्द नहीं बन पाता, तो वह भीड़ में जाकर एक मुस्कान बन जाता है।" क्या अत्यधिक पीड़ा मनुष्य को रुलाती है, या उसे भीड़ का हिस्सा बनकर मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है? हिंदी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा के अप्रतिम हस्ताक्षर त्रिलोचन शास्त्री जी की कविता 'उनका हो जाता हूँ' (प्रतिनिधि कविताएँ, 1985) मानवीय दर्द को छिपाने की सबसे गहरी मनोवैज्ञानिक अवस्था का दस्तावेज़ है। जब हम उनकी कविता चंपा काले-काले अच्छर नहीं चीन्हती पढ़ते हैं, तो हमें एक ग्रामीण बच्ची का सीधा आक्रोश दिखता है; लेकिन इस कविता में कवि की पीड़ा अंतर्मुखी (Introverted) और मौन है। कवि यहाँ बताता है कि जब पीड़ा बेहिसाब हो जाती है , तो वह अकेले बैठकर आँसू नहीं बहाता, बल्कि अजनबी लोगों की भीड़ में जाकर 'उनका' हो जाता है। यह साहित्य के करुण रस को एक बि...
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